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इतिहास के प्रमुख नारे 

Table of Contents

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नारे

इंकलाब जिंदाबाद का नारा 

यह भारतीय इतिहास के स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रसिद्ध नारा है, जिसे भारत की आजादी के समय वर्ष 1929 ईस्वी में क्रांतिकारी भगत सिंह द्वारा दिया गया था। 

भगत सिंह ने इस नारे को सेंट्रल असेंबली दिल्ली में बम का धमाका करते समय दिया था इसके बाद इस नदी की पुकार संपूर्ण भारत में हुई इस नारे का शाब्दिक अर्थ क्रांति की जीत हो या क्रांति अमर हो है। 

यह प्रसिद्ध नारा सर्वप्रथम उर्दू के प्रसिद्ध कवि हसरत मोहनी द्वारा सन 1921 ईस्वी में लिखा गया, इसी कारण इन्हें इस नारे का जन्मदाता कहा जाता है। यह नारा भले ही हसरत मोहानी द्वारा लिखा गया हो लेकिन इस नारे को पहचान भगत सिंह की बुलंद आवाज से मिली। 

यह नारा इतना उत्साह वर्धक था कि इस नारी की पुकार के बाद भारतीय स्वतंत्र सेनानियों के जोश व उत्साह से अंग्रेजों से देश को आजादी मिली। 

इस नारे का प्रमुख उद्देश्य स्वतंत्र सेनानियों के उत्साह को बढ़ाना तथा भारत को गुलाम से आजाद बनाना था। धीरे-धीरे यह नारा भारत के सभी क्रांतिकारियों की कार बन गया था।

जय हिंद का नारा 

यह खासतौर से भारत में प्रचलित एक देश भक्ति पूर्ण नारा है। जो कि भाषणों तथा संवाद में भारत के प्रति देशभक्ति प्रकट करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ भारत की जीत है इस नार का प्रयोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा सन 1941 ईस्वी में आजाद हिंद फौज के गठन के समय किया गया। जय हिंद नाले का सीधा संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस से माना जाता है लेकिन सबसे पहले इस नारे के प्रयोग करता नेताजी सुभाष चंद्र बोस नहीं है बल्कि जय हिंद शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग चेंबाक्रमण पिल्लई द्वारा किया गया। गुलामी के आदी हो चुके देशवासियों में आजादी की आकांक्षा या भावना जगाने के लिए उन्होंने कॉलेज के दौरान अभिवादन के रूप में जय हिंद शब्द का प्रयोग किया। 

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सन् 1933 ईस्वी में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में चेंबाकारमन पिल्लई नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिले तब जय हिंद से उनका अभिवादन किया। पहली बार सुनने पर यह शब्द सुभाष चंद्र बोस को प्रभावित कर गए। 

आजाद हिंद फौज का गठन करने के बाद आजाद हिंद फौज के सैनिक अभिवादन किस शब्द से करें यह सवाल सामने आया तब आबिद हुसैन ने जय हिंद का सुझाव दिया। 

उसके बाद 2 नवंबर 1941 ईस्वी में सुभाष चंद्र बोस ने जय हिंद की पुकार लगाई तब से यह नारा आजाद हिंद फौज का युद्ध घोष बन गया तथा जल्द ही भारत भर में गूंजने लगा। 

इस नारे का प्रमुख उद्देश्य आजाद हिंद फौज के क्रांतिकारियों में देश की आजादी के प्रति जो सजा उषा की भावनाओं को बढ़ाना था।

तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा 

यह प्रसिद्ध नारा 4 जुलाई 1944 ईस्वी को बर्मा में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया। यह प्रसिद्ध नारा नेताजी ने भारतीय स्वतंत्र सेनानियों तथा आजाद हिंद फौज के सैनिकों को संबोधित करते हुए दिया। 

इस नारे के तहत सुभाष चंद्र बोस ने कहा कि अगर आप सभी सैनिक देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार हो तो, मैं आपसे यह वादा करता हूं कि हम सब अपने देश को जल्द से जल्द अंग्रेजों के आदिपत्य से आजाद करा लेंगे। इसके लिए हमें अपने देश की आजादी के लिए प्राणों की परवाह न करते हुए वीरता पूर्वक लड़ना होगा। 

यह नारा देने के बाद अब भारतीय क्रांतिकारियों को यह पूर्ण विश्वास हो गया कि एक ना एक दिन हमारा देश गुलामी की जंजीरों को जरूर तोड़ेगा। 

सुभाष चंद्र बोस द्वारा इस नारे को देने का प्रमुख लक्ष्य देशवासियों का निर्भय होकर आजादी के लिए लड़ना तथा उनके मन में देश को आजाद करने का विश्वास पैदा करना था। यह एक ऐसा नारा साबित हुआ जिसने आजाद हिंद फौज तथा भारतीय स्वतंत्र सेनानियों में जान डाल कर उन्हें एक निर्भय तथा वीर क्रांतिकार बना दिया।

 अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा 

अंग्रेजों भारत छोड़ो यह प्रसिद्ध शब्द एक नारे के साथ एक आंदोलन का भी नाम है। जो अहिंसा के देवता गांधी जी द्वारा 9 अगस्त 1942 ईस्वी को भारत छोड़ो आंदोलन में दिया गया। इस नारे के तहत महात्मा गांधी ने अंग्रेजो की गुलामी की जंजीरों को तोड़ कर उन्हें भारत छोड़ने पर मजबूर किया। 

सुभाष चंद्र बोस का प्रसिद्ध नारा दिल्ली चलो तथा यह नारा एक ही समय दिया गया इसका मुख्य कारण अंग्रेजों का द्वितीय विश्वयुद्ध में लगे रहना तथा भारत में ब्रिटिश शासन की सत्ता स्थापित करने में कुछ कमी आना।

इस नारे का प्रमुख उद्देश्य कई वर्षों से भारत पर सत्ता स्थापित कर रहे अंग्रेजों के शासन को समाप्त कर सभी भारतीयों को स्वतंत्र कर देश के तिरंगे झंडे को फहराना था। यह नारा भारत को आजादी दिलाने में इतना सहायक साबित हुआ कि इस नारे ने एक आंदोलन का रूप ले लिया।

धीरे-धीरे यह नारा काफी लोकप्रिय हुआ जिसकी वजह से आज हम स्वतंत्रता की चैन की सांस ले रहे हैं, तथा भारत को एक स्वतंत्र भारत कह सकते हैं।

जय जवान जय किसान का नारा 

सन 1965 ईस्वी में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय लाल बहादुर शास्त्री द्वारा यह प्रसिद्ध नारा दिया गया। उस समय एक तरफ से भारतीय सेना के सैनिकों की ताकत शक्ति को बढ़ाना तथा दूसरी तरफ किसानों के द्वारा भारत की आर्थिक स्थिति में भी सुधार जाना था। 

इसी बात को ध्यान में रखकर तथा भारतीय किसानों तथा भारतीय सैनिकों को एकजुट कर देश की रक्षा करने के उद्देश्य से लाल बहादुर शास्त्री ने यह नारा दिया। यह नारा भारतीय एकता का एक मूल मंत्र है, इसी कारण भारत में इस नारे का अत्यधिक महत्व माना जाता है। 

लाल बहादुर शास्त्री का मानना था कि अगर किसी देश की सैनिक शक्ति और आर्थिक शक्ति मजबूत है, तो कोई भी विद्रोही राष्ट्र देश का कुछ भी नहीं उखाड़ सकता। 

यह नारा भारत के लिए इतना उपयोगी साबित हुआ कि सन् 1965 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को हार का मुंह दिखा दिया तथा भारतीय किसानों ने भारत की आर्थिक व्यवस्था को भी मजबूत किया। इस नारे का प्रमुख लक्ष्य भारतीय सैनिकों की शक्ति सत्ता भारत की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना था जिससे भारत को एक शक्तिशाली देश बनाया जा सके।

दिल्ली चलो का नारा 

यह प्रसिद्ध नारा सुभाष चंद्र बोस द्वारा सन 1942 ईस्वी में दिया गया। आजाद हिंद फौज के मुख्य नेता सुभाष चंद्र बोस ने द्वितीय विश्वयुद्ध में इंग्लैंड को हारता महसूस किया उस समय इस नारे का प्रयोग कर आजाद हिंद सेना का मार्गदर्शन किया। 

सुभाष चंद्र बोस द्वारा इस नारे को देने का प्रमुख लक्ष्य अंग्रेजों के अत्याचारों को समाप्त कर उन्हें भारत से बाहर निकालना था, तथा भारत की आजादी में इस नारे का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। 

करो या मरो का नारा 

वर्ष 1940 ईस्वी में भारतीय जनता तथा स्वतंत्र सेनानियों ने देश को आजाद कराने की भावना उमड़ रही थी। इस बात का पता लगाकर महात्मा गांधी ने सन 1942 ईस्वी में करो या मरो के नारे की पुकार लगाई। यह नारा भारतीय लोगों में आजादी की भावनाओं को बढ़ाने में कारगर साबित हुआ। 

इस नारे के तहत महात्मा गांधी ने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए भारतीय जनता तथा स्वतंत्र सेनानियों को एक साथ मिलकर संघर्ष करने को कहा। 

करो या मरो नारे का प्रमुख लक्ष्य अंग्रेजों की विरोधी नीतियों से संघर्ष करना था। इस प्रसिद्ध नारे से भारतीय स्वतंत्र सेनानियों को एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार तथा अंग्रेजों का सामना करने की प्रेरणा मिली। 

स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है का नारा 

यह भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का सुप्रसिद्ध नारा है जो वर्ष 1890 ईसवी में लोकमान्य के नाम से प्रचलित स्वतंत्रता के अग्रणी बाल गंगाधर तिलक द्वारा दिया गया। 

इस नारे से बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय स्वतंत्र सेनानियों के सीने में देश को आजाद कराने की भावना की मुहर लगाई। इनके अनुसार स्वराज भारत के लोगों का अधिकार है जिसे भारत में शासन स्थापित कर अंग्रेजों ने छीन रखा है। 

बाल गंगाधर तिलक द्वारा दिया गया यह नारा भारतीय स्वतंत्र सेनानियों के मन में इस कदर छाया कि उनके मन में आजादी की भावना का अर्थ स्पष्ट हुआ। इस नारे के साम्राज्य का अर्थ अपनी सता या शासन और जन्म सिद्ध का अर्थ जन्म से मिलने वाला अधिकार है। 

इस नारे का एकमात्र उद्देश्य सभी भारतीयों तथा स्वतंत्र सेनानियों को स्वतंत्र रूप से जीने के अधिकार को दिला कर भारत में ब्रिटिश सत्ता को समाप्त करना। 

मरो नहीं मारो का नारा 

भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के समय इस नारे को लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दिया गया। इस नारे को करो या मरो का दूसरा रूप माना जाता है। 

यह वही नारा था जिसके कारण भारतीयों के मन में आजादी की भावना का प्रचंड आगाज हुआ। यह नारा बहुत ही जल्द भारत के प्रत्येक स्वतंत्र सेनानी की जुबान पर आ गया और पानी की तरह फैल गया। 

सन 1942 ईस्वी में अहिंसा की भावना रखने वाले भारतीयों की वजह से भारत को कमजोर समझा जाता था इसी बात को भांपते हुए तथा भारतीय क्रांतिकारियों के मन में इस भावना को जगाने के लिए कि हमें अंग्रेजों से भारत की आजादी मांगने के बजाय आजादी छिननी होगी। 

इसी कारण इस नारे ने एक हिंसक रूप ले लिया लेकिन उस समय भारत को किसी भी हाल में देश को आजाद करना था इसलिए उस समय इस नारे का आगाज करना जायज था।

साइमन कमीशन वापस जाओ का नारा 

यह प्रसिद्ध नारा सन 1942 ईस्वी में लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दिया गया। सन् 1927 ईस्वी में अंग्रेजों द्वारा सात ब्रिटिश सांसदों की एक समिति बनाई गई जिसमें यह तय किया गया कि भारत में साइमन कमीशन नामक एक कानून लाया जाएगा, जिसके तहत किसी भी भारतीय क्रांतिकारी या व्यक्ति को केवल शक के आधार पर गिरफ्तार कर लिया जाएगा। 

यह निर्णय भारतीयों के लिए उचित नहीं था तो इसका विरोध करने के लिए सर्वप्रथम लाला लाजपत राय द्वारा इस नारे का आगाज किया गया। 

इस कमीशन का विरोध करते हुए लाला लाजपत राय के सिर पर लाठी का फरार होने के कारण मृत्यु हो गई। इस नारे का प्रमुख उद्देश्य अंग्रेजों की नीतियों तथा साइमन कमीशन का विरोध करना था। 

वंदे मातरम का नारा 

वंदे मातरम यह भारत का नारा होने के साथ भारत का राष्ट्रीय गीत भी है। इस सुप्रसिद्ध गीत के रचनाकार बकिम चंद्र चटर्जी है। उनके द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक आनंद मठ से यह गीत संकलित है। इस गीत में संस्कृत तथा बंगला दोनों भाषाओं का मिश्रण है। 

इस गीत की गायन की अवधि 1 मिनट 5 सेकंड रखी गई है। जिसे सर्वप्रथम 1807 ईस्वी में कोलकाता अधिवेशन में गाया गया। 

एक गीत के साथ इसे एक नारे के रूप में भी लोकप्रियता प्राप्त हुई तथा देश को आजाद करने में तथा क्रांतिकारियों में जोश की भावना जगा कर भारत को स्वतंत्र बनाने में इस नारे का महत्व पूर्ण योगदान है।

कर मत दो  का नारा 

यह प्रसिद्ध नारा सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा सन 1918 ईस्वी में खेड़ा आंदोलन के दौरान दिया गया। सन 1918 ईस्वी में गुजरात के खेड़ा नाम के स्थान पर वर्षा न होने के कारण अकाल पड़ा, इसीलिए भारतीय किसानों ने अंग्रेजों से यह विनती की कि इस वर्ष किसानों द्वारा दिए जाने वाले कर में कमी की जाए, लेकिन अंग्रेजों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। 

अंग्रेजों की मनमानी नीतियों को रोकने तथा कर में कमी करने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस नारे का आगाज किया तथा अंत में ब्रिटिश सरकार को किसानों के इस प्रस्ताव को स्वीकार करना पड़ा। 

इस नारे का एकमात्र उद्देश्य भारतीय किसानों द्वारा दिए जाने वाले कर में कटौती तथा उसे पूरी तरह समाप्त करना था।

सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा का नारा 

यह एक नारा न होकर एक लोकप्रिय गीत है, जो भारत को स्वतंत्रता मिलने से लेकर आज तक काफी लोकप्रिय है। 

यह सुप्रसिद्ध गज़ल सन 1905 ईसवी में मोहम्मद इकबाल द्वारा लिखी गई। इस ग़ज़ल का अर्थ यह स्पष्ट होता है कि हमारा भारत विश्व के सबसे कुशाल राष्ट्रों में से एक है, तथा हमें एकजुट रहकर हमारे देश को और अधिक लोकप्रिय बना कर विश्व में देश के झंडे को फहराना है। 

इस ग़ज़ल का प्रमुख उद्देश्य सभी भारतीयों में एकता की भावना से सभी को एकजुट करना। 

मारो फिरंगी को 

यह प्रसिद्ध नारा सन 1857 की क्रांति के समय क्रांतिकारी मंगल पांडे ने दिया था। यह नारा एक क्रांति का नारा था, जिसने सन 1857 की क्रांति में अपना अहम योगदान दिया था, तथा क्रांतिकारियों में लोकप्रिय हुआ था। 

सन 1857 की क्रांति का यह सर्वप्रथम नारा है जो कि ब्रिटिश सरकार या अंग्रेजो के खिलाफ था। इस नारे की मदद से मंगल पांडे ने फिरंगी अर्थात अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने की बात कही।

पूर्ण स्वराज का नारा 

सन 1928 ईस्वी के लाहौर अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा पूर्ण स्वराज अर्थात पूरी तरह से आजादी की मांग की गई। 

इस बात को एक नारे  के रूप में लेकर आजादी की लड़ाई को लड़ने के प्रस्ताव को पारित किया गया था। यह वही नारा है जिसके वजह से भारत की आजादी की लड़ाई का आगाज हुआ तथा क्रांतिकारियों के ह्रदय में आजादी की भावना का बढ़ावा हुआ। 

इस नारे का एकमात्र उद्देश्य भारत को अंग्रेजो की गुलामी से आजाद कर पूर्णचंद्र बनाना था।

साम्राज्यवाद का नाश हो का नारा 

यह क्रांति का नारा वर्ष 1929 ईस्वी में असेंबली बम कांड के बाद क्रांतिकारी भगत सिंह द्वारा दिया गया। इस नारे का अर्थ साम्राज्यवाद का नाश हो अर्थात ब्रिटिश शासन का अंत हो है। यह नारा भगत सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ क्रांतिकारी भावना से दिया। इस नारे को देने का एकमात्र उद्देश्य अंग्रेजी शासन को समाप्त करें भारत को स्वतंत्र बनाना था। 

आराम हराम है का नारा 

यह प्रसिद्ध नारा पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिया था उनका मानना था कि कार्य और मेहनत व्यक्ति के जीवन में उतने ही जरूरी है जितना रोटी और कपड़ा। 

इससे यह कहा जा सकता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के जीवन में काम तथा मेहनत का अत्यधिक महत्व था। इस नारे से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देशवासियों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि हमें मेहनत कर देश को एक कुशाल राष्ट्र बनाने में योगदान देना है। 

इस नारे को आज भी काफी लोकप्रियता प्राप्त है तथा इस नारे से लोगों की मेहनत के राष्ट्र को मजबूती मिली है।


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🔹 इतिहास के प्रमुख युद्ध

🔸 प्रमुख वचन और नारे महत्वपूर्ण प्रश्न

🔹 स्वतंत्रता दिवस महत्वपूर्ण प्रश्न

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