मार्क्सवाद और उदारवाद में अंतर । marksvad aur udarvad me antar । pdf SUPER HINDI STUDY

   मार्क्सवाद और उदारवाद

इस पोस्ट में मार्क्सवाद और उदारवाद में अंतर, मार्क्सवाद की प्रमुख विशेषताएं, मार्क्सवाद की प्रमुख आलोचनाएं, उदारवाद की प्रमुख विशेषताएं और उदारवादी प्रमुख आलोचनाओं का वर्णन किया गया है। साथ ही इन सभी नोट्स की पीडीएफ डाउनलोड करने का लिंक भी इस पोस्ट के लास्ट में दिया गया है।

मार्क्सवाद और उदारवाद

मार्क्सवाद और उदारवाद में अन्तर

राजनीति के संबंध में मार्क्सवाद और उदारवाद दोनों एक दूसरे के विरोधी विचारधाराएं मानी जाती है। इन दोनों विचारधाराओं में विद्वानों ने अंतर स्पष्ट करते हुए निम्नलिखित अंतर का वर्णन किया है –

1. परिभाषा संबंधित अंतर

मार्क्सवाद की विचारधारा का प्रतिपादक कार्ल मार्क्स को माना जाता है

मार्क्सवाद- कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजिल्स में दर्शन इतिहास समाजशास्त्र विज्ञान तथा अर्थशास्त्र की विभिन्न समस्याओं पर विचार विमर्श एवं विवेचना करते हुए एक सुनिश्चित विचारधारा विश्व के सामने रखी इसी विचारधारा को मार्क्सवाद कहा जाता है।

उदारवाद- यह वह विचारधारा है जिसके अंतर्गत मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते हुए सामाजिक संस्थाओं को मनुष्य की सूझ-बूझ और सामाजिक प्रयास माना जाता है इसी विचारधारा को उदारवाद कहा जाता है।

उदारवाद का पिता जॉन लॉक को माना जाता है।

 2.राज्य के संबंध में अंतर

उदारवादी विद्वानों का विचार है कि राज्य सामाजिक समझौते की देन है राज्य के अस्तित्व में आने से पहले व्यक्ति प्रकृति के राज्य में रहता था। जिस से छुटकारा पाने के लिए एक समझौता किया गया जिसके परिणाम स्वरुप राज्य का जन्म हुआ।

जबकि मार्क्सवादी विचारकॊ का मानना है कि जब समाज दो विरोधी वर्ग (अमीर वर्ग और गरीब वर्ग) में बंट गया था, तब अमीर वर्ग ने अपने हितों की रक्षा के लिए राज्य नाम की संस्था को जन्म दिया।

3.राज्य के स्वरूप में अंतर

अधिकतर उदारवादी राज्य को कल्याणकारी संस्था मानते हैं। और उनका मानना है कि वर्तमान में उच्च राज्य को श्रेष्ठ माना जाता है, जो अधिक से अधिक लोगों का कल्याण करता हो।

इसके विपरीत मार्क्सवाद राज्य को वर्गों का संगठन मानता है। उनका विचार है कि राज्य केवल उसी वर्ग के हितों का कल्याण करता है जिसके हाथों में राज्य की शक्ति होती है। और पूंजीवादी राज्य में राज्य की समस्त शक्तियां पूंजीपतियों के हाथों में विद्यमान होती है।

4.राज्य के उद्देश्य में अंतर

उदार वादियों के अनुसार राज्य का उद्देश्य लोगों के जीवन को अधिक से अधिक कुशल और सूखी बनाना है।

जबकि मार्क्स वादियों के अनुसार राज्य उच्च वर्ग के हितों की रक्षा करता है। इस वर्ग का राज्य की स्थिति पर नियंत्रण रहता है।

5.राज्य के आधार संबंधी अंतर

उदारवाद व्यक्ति की इच्छा को राज्य का आधार मानता है। इनका मानना है कि प्राकृतिक राज्य में व्यक्तियों ने आपस में अपनी इच्छा से समझौता किया था जिसके परिणाम स्वरुप राज्य अस्तित्व में आया था।

जबकि मार्क्सवाद शक्ति को राज्य का आधार मानता है। इनका मानना है कि शक्ति के द्वारा ही राज्य कायम रह सकता है। मार्क्सवादी यों के अनुसार पुलिस, सेना, न्यायालय, राज्य के शक्ति के प्रतीक होते हैं। जिनका प्रयोग शासक वर्ग द्वारा विरोधियों का विरोध एवं उन्हें समाप्त करने के लिए किया जाता है।

6.राज्य के भविष्य के संबंध में अंतर

उदारवादी विचारक राज्य को स्थाई संस्था मानते हैं और उनका विचार है, कि व्यक्ति को सदैव इनकी आवश्यकता रहेगी। और इस तरह यह कभी न समाप्त होने वाली संस्था है।

जबकि मार्क्सवादी विचारक राज्य को अस्थाई संस्था मानते हैं। इनका मानना है कि वर्गों की समाप्ति से राज्य की आवश्यकता भी नहीं रहेगी, तथा धीरे-धीरे राज्य स्वयं भी आलोप हो जाएगा और मार्क्सवाद राज्य और वर्ग के बिना समाज की स्थापना करते हैं।

7.साधनों के संबंध में अंतर

उदारवादी विचारधारा क्रांतिकारी साधनों का विरोध करती है। और वह संवैधानिक साधन का समर्थन करती है। यह परिवर्तन लाने के लिए शांति में अहिंसक साधनों को अपनाने के पक्ष में है। मार्क्सवाद और उदारवाद

जबकि मार्क्सवादी विचारधारा क्रांतिकारी साधन अपनाने के पक्ष में है। और संवैधानिक साधनों को वे पूंजीवादी राज्य के विरुद्ध मानते हैं। और इसके प्रयोग द्वारा पूंजीवादी गरीब लोगों का शोषण करते हैं।

उदारवाद की प्रमुख विशेषताएं

  1. उदारवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता और आजादी को व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार मानता है तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है।
  2. उदारवादी सिद्धांत मानव की  विवेकशीलता मे आस्था रखते हैं इनका मानना है कि व्यक्ति जन्म से अंत तक अपनी विवेकता से ही विकास का मार्ग निर्धारित करता है।
  3. उदारवादी सिद्धांत ऐतिहासिक एवं परंपरागत विचारधाराओं का विरोध करते हैं इनका मानना है कि यह सभी परंपराएं व्यक्ति को कमजोर बनाती है इसी कारण उदारवादी सिद्धांत पुरानी व्यवस्थाओं तथा परंपराओं की जगह नवीन परंपराओं को महत्व देते हैं।
  4. उदारवादी सिद्धांत धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करते हैं।
  5. उदारवादी विचारक व्यक्ति को आर्थिक क्षेत्र में पूरी तरह स्वतंत्र रखने की बात करते हैं तथा उनका मानना है कि राज्य को व्यक्ति के द्वारा किए जाने वाले व्यापार में कोई भी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
  6. उदारवादी विचारक लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करते हैं इनका मानना है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था अति महत्वपूर्ण है साथ ही लोकतंत्र का समर्थन करते हुए उदार वादियों ने कहा है कि राज्य का शासन व्यक्ति के द्वारा ही निर्मित होना चाहिए।
  7. उदारवादी विचारधारा इन लोक कल्याणकारी व्यवस्था की प्रबल समर्थक है उदार वादियों के लोक कल्याणकारी व्यवस्था के समर्थन के कारण ही राज्य या देश की सरकारें जनकल्याण के लिए कार्य करती प्रतीत हो रही है।
  8. उदारवादी सिद्धांत निरंकुशता वाद के साथ साम्राज्यवाद का भी विरोध करते हैं उनका मानना है कि हर राष्ट्र का शासन राज्य के नागरिकों की इच्छा अनुसार ही निर्मित होना चाहिए।
  9. उदार वादियों का मानना है कि आधुनिक उदारवाद ने व्यक्ति तथा राज्य के मध्य की खाई को कम करने का प्रयास किया है।
  10. उदारवादी विचारों ने राज्य को कृत्रिम संस्था मानते हुए मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास पर बल दिया है।
  11. उदारवादी सिद्धांत विधि के शासन की मांग करते हैं इनका मानना है कि विधि के शासन के अभाव में नागरिकों की स्वतंत्रता ओं का हनन होता है।
  12. उदारवादी सिद्धांत बंधुत्व की भावना के समर्थक है उनका मानना है कि विश्व के विकासवादी सिद्धांतों से ही प्रत्येक देश का विकास हुआ है इसी कारण यह सिद्धांत से विश्वशांति पर जोर देते हैं।
  13. यह कहा जा सकता है कि उदारवादी विचारक मनुष्य की स्वतंत्रता को माननीय विवेचना मानते हुए राज्य को व्यक्ति का पोषक तत्व कहा है।

मार्क्सवाद की प्रमुख विशेषताएं

  1. मार्क्सवादी सिद्धांत है विश्व की व्यवस्था को पहचानने और उसे परिवर्तित करने में सहायक है।
  2. मार्क्सवाद वह सिद्धांत है जिसके अभाव में समाज शास्त्र एवं अर्थशास्त्र के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट कर पाना संभव नहीं है।
  3. मार्क्सवादी सिद्धांत दार्शनिक सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली का समावेश है जिसे कभी नहीं नकारा जा सकता।
  4. मार्क्सवाद वैज्ञानिक साम्यवाद और समाज की भौतिकता वादी सिद्धांतों को जोड़ने में सफल हुआ है।
  5. मार्क्सवाद ने विकास के उच्चतम स्तर पर बल दिया है।
  6. मार्क्सवाद व्यक्ति के आपसी संबंध तथा व्यक्ति के स्वभाव को जोड़ने में सहायक सिद्ध हुआ है।
  7. मार्क्सवाद में उदारवाद को चुनौती देते हुए निर्णय वाद का समर्थन किया है।
  8. मार्क्सवाद ने श्रमिक व सर्वहारा वर्ग में चेतना जागृत की है।
  9. मार्क्सवाद ने विचारों के व्यावहारिक रूप को प्रस्तुत किया है।
  10. कार्ल मार्क्स की राज्य व शासन संबंधी विचार अन्य  विचारधाराओं से अलग है।
  11. मार्क्सवाद ने राज्य तथा वर्ग विहीन समाज की स्थापना का आधार प्रस्तुत किया है।
  12. मार्क्सवादी विचारक विश्व के सभी मजदूरों को एक होने का संदेश देते हैं।
  13. मार्क्सवाद ने मजदूर वर्ग में एक नई आस्था उत्पन्न की है।
  14. मार्क्सवादसमाज का यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत किया है। मार्क्सवाद ने इतिहास की आर्थिक व्यवस्था से पूंजीवाद के अंत व स्थान विवाद के आगमन की घोषणा करता है।
  15. मार्क्सवाद ने भौतिकवाद व द्वंदातक पद्धति के आधार को मिलाकर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या की है।
  16. कार्ल मार्क्स ने ही सबसे पहले वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन करें एक व्यवहारिक योजना प्रस्तुत की थी।
  17. मार्क्सवाद ने इतिहास विज्ञान अर्थशास्त्र समाजशास्त्र तथा दर्शन की विभिन्न समस्याओं का समाधान किया है।

मार्क्सवाद ने अपने सिद्धांतों के स्रोत विभिन्न विचारधाराओं से ग्रहण किए हैं लेकिन इन सिद्धांतों में मार्क्सवाद ने अपने सिद्धांतों की नींव रखी है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि कार्ल मार्क्स ने चाहे इंटों को बहुत से स्थानों से एकत्रित किया हो परंतु साम्यवाद का जो विशाल भवन बनाया है वह सर्वदा मौलिक है।

उदारवाद की प्रमुख आलोचना

  1. आलोचकों ने उदारवाद की आलोचना करते हुए कहा है कि उदार वादियों द्वारा वितरण आत्मक न्याय पर बल देने के कारण उदारवाद बुजुर्गों व्यवस्था का प्रबल समर्थक बन गया है।
  2. एडमंड बर्क ने उदारवाद की आलोचना करते हुए कहा है कि उदारवाद ने इतिहास और परंपरा दोनों का विरोध किया है जिसके कारण यह दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए हैं।
  3. उदारवाद द्वारा राज्यों को कृत्रिम व्यवस्था का व्यवस्थित रूप मानना उचित न मानते हुए आलोचकों ने आलोचना करते हुए कहा है कि राज्य कृत्रिम व्यवस्था का विकसित रूप न होकर सामाजिक प्रणाली का विकसित रूप है।
  4. आलोचकों ने आधुनिक उदारवाद व परंपरागत उदारवाद के सिद्धांतों के एक समान न होना कहकर भी उदारवाद के रोशनी की है।
  5. उदारवादी आलोचकों का मानना है कि उदारवाद द्वारा निरपेक्ष स्वतंत्रता पर बल देना अनुचित है।
  6. नक्सलवादियों ने उदारवाद की आलोचना करते हुए कहा है कि यह परंपरागत तथा ऐतिहासिक परंपराओं का विरोध करता है तथा आर्थिक क्षेत्रों में व्यक्ति को स्वतंत्र बनाने का प्रयत्न करता है जिससे राज्य की कानून व्यवस्था भंग होने का खतरा बना रहता है।
  7. उदारवादी स्वरूप गरीबों की क्रांतिकारी आवाज को दबाने का प्रपंच है।
  8. उदारवादी सिद्धांतो ने राज्य को मजबूत बनाने पर जोर दिया हैं ताकि गरीबों को राजनीतिक व्यवस्था के नाम पर दबाया जा सके।
  9. उदारवादी व्यवस्था का सामाजिक न्याय काल्पनिक है।
  10. यह स्वतंत्रता के लिए आवश्यक सामाजिक परिस्थितियों का बनाया जाना राज्य पर छोड़ता है वह पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त नहीं करता।
  11. उदारवाद का आर्थिक समाज बाजारों समाज है जो केवल बुजुर्गों वर्ग के हितों का ध्यान रखता है सामान्य व्यक्ति के हितों को अनदेखा करता है।

मार्क्सवाद की प्रमुख आलोचना

  1. मार्क्सवाद पूंजीवाद का सही आकलन करने में असफल रहा है
  2. मार्क्सवाद ने समाज को दो वर्गों जिनके पास सब कुछ नहीं है तथा जिनके पास सब कुछ है में विभाजित किया है लेकिन यह वास्तविकता नहीं है।
  3. मामार्क्सवाद ने पूंजी संग्रह की बात कही है लेकिन वास्तव में पूंजी का बिखराव हो गया है।
  4. मार्क्सवादी सिद्धांतों के स्रोत विभिन्न विचारधाराओं से ग्रहण किए गए हैं।
  5. मार्क्सवाद ने संघर्ष को सर्वोपरि मानना है जबकि वास्तव में सामाजिक जीवन का मूल तत्व सहयोग है संघर्ष नही।
  6. मार्क्सवाद सामाजिक व आर्थिक वर्ग में अंतर स्पष्ट करने में असमर्थ रहा था।
  7. मार्क्सवाद ने क्रांति का प्रमुख स्रोत श्रमिक वर्ग को बताया है लेकिन वास्तव में क्रांति श्रमिक वर्ग की बजाय बुद्धिजीवी वर्ग से संभव है।
  8. कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत एकांकी व दोषपूर्ण है।
  9. मार्क्सवाद के कुछ सिद्धांतों में पूंजी लागत व मानसिक श्रम हनन किया गया है।
  10. मार्क्सवाद के सिद्धांत विरोधाभास से मुक्त है।
  11. कार्ल मार्क्स द्वारा राज्य के विलुप्त होने की मान्यता कल्पना मात्र है ।
  12. मार्क्सवाद ने राज्य को एक अस्थाई संस्था माना है जबकि वास्तविक रूप से देखा जाए तो राज्य एक स्थाई संस्था है।
  13. लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा धर्मनिरपेक्षता के संबंध में मार्क्सवादी सिद्धांत अनुचित है।
  14.  मार्क्सवाद के सिद्धांत व्यक्ति द्वारा हिंसा को बढ़ावा देते हैं जो कि समाज की एकता के लिए घातक है।
  15. मार्क्सवाद व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता का विरोधी है।

मार्क्सवादी आलोचकों का मानना है कि मार्क्सवादी विचार को ने भविष्यवाणी की थी कि पूंजीवाद के विकास के साथ मध्यमवर्ग विलीन हो जाएगा और सर्वहारा वर्ग के साथ मिल जाएगा लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है और ऐसा होने की संभावना भी नहीं है वास्तव में इसके विपरीत हुआ है इस आधार पर कहा जा सकता है कि मार्क्सवाद जियों की मान्यता उचित नहीं है।

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