इस पोस्ट में कक्षा 10 के सामाजिक विज्ञान विषय के भाग 2 भारत और समकालीन विश्व के अध्याय 2 भारत में राष्ट्रवाद का उदय के पाठ्यपुस्तक के प्रमुख प्रश्न उत्तर और अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर दिए गए हैं। इस पोस्ट में दिए गए भारत में राष्ट्रवाद का उदय के महत्वपूर्ण प्रश्न उतर कक्षा 10 के आने वाले बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है।

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भारत में राष्ट्रवाद का उदय प्रश्न उत्तर । भारत में राष्ट्रवाद Question Answer PDF class 10

महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. रोलेट एक्ट कब लागू हुआ

उत्तर – 1919 में

 

प्रश्न 2: गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत कब लौटे ?

उत्तर – 1915

 

प्रश्न 3. “जलियावाला बाग हत्याकाण्ड कब और कहाँ हुआ ?

उत्तर – 13 अप्रैल 1919 में अमृतसर ।

 

प्रश्न 4. इनलैण्ड एमिगेशन एक्ट क्या था ?.

उत्तर – बगानों में काम करने वाले मजदूरों को इस एक्ट के तहत बिना इजाजत बगान से बाहर जा नेकी अनुमती नहीं थी 

 

प्रश्न 5 गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन कब और किस घटना से वापस लिया ?

उत्तर -1922 में चैरीचैरा की घटना ने गाँधी जी को बहुत ही विक्षुब्ध किया जिसमें भारतीय क्रांतिकारियों ने चैरीचैरा पुलिस स्टेशन में आग लगा दी।

 

प्रश्न 6. खिलाफत आंदोलन कब और किसके द्वारा शुरू किया गया?

उत्तर – 1919 में शौकत अली और मुहम्मद अली ने

 

प्रश्न 7 काग्रेस में समाजवादी विचारधारा लाने वाले दो नेताओं का नाम बताइए।

उत्तर – 1. जवाहर लाल नेहरू

2. सुभाष चन्द्र बोस

 

प्रश्न 8: गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन कब और किस घटना से वापस लिया ? 

उत्तर- 1922 में, चौरीचौरा की घटना ने गांधी जी को बहुत ही विक्षुब्ध किया जिसमें भारतीय क्रांतिकारियों ने चौरीचौरा पुलिस स्टेशन में आग लगा दी। कई पुलिस वाले मारे गए

 

प्रश्न 9: स्वराज पार्टी का गठन किसने किया ?

उत्तर- 1 जनवरी 1923

 

प्रश्न 10: पिकेटिंग का क्या अर्थ है?

उत्तर – प्रदर्शन या विरोध का एक ऐसा स्वरूप जिसमें लोग किसी दुकान, फैक्ट्री, दफ्तर के भीतर जाने का रास्ता रोक लेते हैं।

 

प्रश्न 11: पूर्ण स्वराज की माँग कब और कहाँ की गई?

उत्तर – पूर्ण स्वराज की मॉग 1929 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में की।

 

प्रश्न 12. डॉ० अम्बेडकर ने दलितों के लिए कौन सी एसोसिएशन को संगठित किया और कब ?

उत्तर – डॉ० आबेडकर में 1930 में दलितों के लिए दमित वर्ग एसोसिएशन बनाया

 

प्रश्न 13: वंदेमातरम् गीत के रचयिता कौन थे ?

उत्तर- बंकिम चन्द्र चटर्जी |

 

प्रश्न 15: खिलाफत आन्दोलन कब और किसके द्वारा शुरू किया गया?

उत्तर – खिलाफत आन्दोलन 1919 में दो भाइयों शौकत अली और मुहम्मद अली के द्वारा शुरू किया गया

 

प्रश्न 16: भारतीय राष्ट्रिय काग्रेस की स्थापना कब और किसने की?

उत्तर – 1885 ई० में ए० ओ० ह्युम ने किया था।

 

प्रश्न 17:1920 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा लिया गया कोई एक महत्वपूर्ण फैसला बताइए

उत्तर – इस अधिवेशन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग द्वारा असहयोग एवं खिलाफत आन्दोलन चलाने का फैसला लिया गया।

 

प्रश्न 18 सत्याग्रह का अर्थ बताइए ।

उत्तर – सत्याग्रह का अर्थ सत्य के लिए आग्रह करना | यदि उद्देश्य सच्चा है और अन्याय के खिलाफ है तो उत्पीडन के खिलाफ मुकाबला करने के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।

 

प्रश्न 19: बेगार का अर्थ बताइए?

उत्तर – बिना किसी पारिश्रमिक (मेहनताना) के किसी के काम करवाना बेगार कहलाता है।

 

प्रश्न 20: गिरमिटिया मजदुर किसे कहते हैं?

उत्तर – औपनिवेशिक शासन के दौरान बहुत सारे लोगों को काम के लिए फिजी, गुयाना, वेस्टइंडीज आदि स्थलों पर ले जाया गया जिन्हें बाद में गिरमिटिया कहा जाने लगा। जिस अनुबंध के अंतर्गत उन मजदूरों को बाहर ले जाया जाता था उसे गिरमिट कहते थे।

 

प्रश्न 21: पूना पैक्ट में किन दो नेताओं के बीच समझौता हुआ?

उत्तर – डॉ० भीम राव अम्बेडकर और महात्मा गाँधी के बीच  

 

प्रश्न 22:  महात्मा गाँधी द्वारा किसानों के पक्ष में आयोजित किए गए दो मुख्य सत्याग्रहों का नाम बताइए।

उत्तर –

1. गाँधी जी ने बिहार के चम्पारण के किसानों के सहयोग से सत्याग्रह प्रारम्भ किया और किसानों को उरा खेती प्रणाली के विरुद्ध प्रेरित किया।

2. गाँधी जी ने गुजरात के खेड़ा जिला के किसानों के पक्ष में सत्याग्रह किया जो फसल न होने के कारण, प्लेग और महामारी के कारण भू राजस्व नहीं दे सके थे।

 

प्रश्न 23. गदर पार्टी के प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए और राष्ट्रीय आंदोलन में गदर पार्टी की क्या भूमिका थी?

उत्तर – 

गदर पार्टी के प्रमुख नेताओं के नाम थे रासबिहारी बोस लाला हरदयाल, मैडम कामा और राजा महेन्द्र प्रताप ।

1. इस पार्टी के नेताओं ने विदेशों में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध जनमत तैयार किया ।

2. गदर पार्टी के प्रमुख नेताओं ने रास्ट्रीय आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया।

 

प्रश्न. 24. भारतीय नेताओं के 1919 में सलेक्ट एक्ट के विरोध करने के क्या कारण थे?

उत्तर – 1. इस कानून ने अंग्रेजी सरकार को यह शक्ति दे दी थी कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाये जेल में डाल दे।

2. उसके लिए किसी वकिल दलील और अपील की अनुमति नहीं थी।

3. यह कानून भारतीयों को उत्पिडित करने के उद्देश्य से लाया गया था ।

4. अंग्रेजी शासन रापॅलेक्ट एक्ट लाकर स्वतंत्रता संग्राम की लहर को दबाना चाहती थी।

 

प्रश्न: 25. भारतीयों ने साइमन कमीशन का विरोध क्यों किया?

उत्तर – भारतीयों द्वारा साइमन कमीशन का विरोध किए जाने के निम्नलिखित कारण थे: 

1. इस कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था । 

2. इस कमीशन की धाराओं में भरतीयों को स्वराज्य दिए जाने का कोई जिक्र नही था।

 

प्रश्न.26. अंग्रेजो द्वारा साइमन कमीशन को लाने के क्या उद्देश्य थे?

उत्तर – अंग्रेजो द्वारा साइमन कमीशन को लाने के निम्नलिखित उद्देश्य थे:

1. 1919 के गर्वनमेंट आफ इंडिया एक्ट की समीक्षा की जा सके

2. यह सुझाव दिया जा सके कि भारतीय प्रशासन में कौन से नए सुधार लाया जा सके 

3. भारत में पैदा तत्कालीन राजनीतिक गतिरोध को दूर किया जा सके ।

 

प्रश्न.27. पूना पेक्ट क्या है इस पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो ।

उत्तर – महात्मा गांधी ने ब्रिट्रिश निर्णयों के विरुद्ध जेल में रहते हुए अनिश्चितकालीन उपवास रख लिया था जिससे सारे देश में हलचल मच गई थी। अपने प्रिय नेता के प्राणरक्षा के लिए मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं ने डाक्टर भीमराव अम्बेडकर से दलितों के पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मार्ग छोड़ देने की आग्रह की इस विषय पर दोनो पक्षों में 25 सितम्बर 1932 को एक समझौता हुआ जिसे पूना पेक्ट कहा गया। 

 

प्रश्न.28. गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का फैसला क्यों किया ?

उत्तर -गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लिए जाने के निम्नलिखित कारण थे: 

1. चौरी चौरा की घटना से गाँधीजी काफी परेशान हो उठे जिससे उन्हें विश्वास हो गया कि लोगों को वे अब शांत नहीं रख सकेंगे।

2. वे सोचने लगे कि यदि लोग हिंसक हो जाएगे तो अंग्रेजी सरकार भी उत्तेजित हो जाएगी, जिससे र्निदोष लोग भी मारे जाएगे ऐसे में उन्होंने 1922 में इस आंदोलन को वापस लेना ही उचित समझा ।

 

प्रश्न. खिलाफत और असहयोग आंदोलन से क्या तात्पर्य है ? इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं के नाम लिखो ।

उत्तर – खिलाफत आन्दोलन: खिलाफत आंदोलन दो अली भइयो (मोहम्द अली और शौकत अली) ने 1919 में शुरू किया क्योंकि मित्र राष्ट्रों ने तुर्की को पराजित करके उसकी बहुत सी बस्तियों को आपस में बड़े अन्यायपूर्ण ढंग से बाँट लिया था। कांग्रेस के नेताओं ने इन अली भइयों का पूर्ण साथ दिया ।

असहयोग आंदोलन: सन् 1920 में अंग्रजी सरकार के अत्याचार पूर्ण व्यवहार अन्यायपूर्ण बर्ताव का विरोध करने के लिए कांग्रेस ने महात्मा गाँधी और मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में एक अन्य आंदोलन शुरू किया जिसे असहयोग आंदोलन के नाम से जाना गया। इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं के नाम: मोहम्द अली और शौकत अली, महात्मा गाँधी और मोतीलाल नेहरू आदि थे ।

 

प्रश्न. प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया ?

उत्तर – प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में निम्न योगदान दिया:

1. प्रथम विश्व युद्ध 1914-18ई तक चला। इस काल में भरतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गति मिली। साथ ही साथ राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा।

2. अंग्रजों ने भरतीयों से पूछे बिना भारत को युद्ध में एक पार्टी बना दिया साथ ही साथ भारत के संसाधनों का अपने हित के लिए धडल्ले से प्रयोग किया इससे भारतीयों में अंग्रेजो के प्रति विरोध करने की जज्बा पैदा हुआ।

3. यद्यपि मुस्लिम लीग अंग्रजी सरकार की बांदी थी परन्तु प्रथम महायुद्ध के घटनाओं के कारण इसे कांग्रेस के समीप आना पड़ा जिससे राष्ट्रीय आंदोलनों में काफी सहायता मिली

4. इस महायुद्ध के कारण मुस्लिम विशेषकर मुस्लिम लीग अंग्रेजों के विरुद्ध हो गये क्योंकि महायुद्ध की समाप्ति के बाद मित्र राष्ट्रों ने तुर्की के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया

 

प्रश्न. सविनय अवज्ञा आन्दोलन की चार सीमाओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – सविनय अवज्ञा आन्दोलन की चार सीमॉए निम्नलिखित हैं: – 

1. जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ उस समय समुदायों के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था 

2. कांग्रेस से कटे हुए मुस्लमानों का एक तबका किसी संयुक्त संघर्ष के लिए तैयार नहीं था। 

3. भारत के विभिन्न धार्मिक नेताओं और जाति समूहों के नेताओं ने अपनी आनी माँगे शुरू कर दी जिससे सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति इन्होंने कोई खास रूचि नहीं दिखाई 

4. धीरे धीरे हिंदू और मुस्लमानों के बीच संबंध खराब होते गये कई शहरों में सांप्रादायिक टकराव और दंगे हुए जिससे दोनों समुदायों के बीच फासले बढ़ते गये।

 

प्रश्न. कॉग्रेस के तीन गरम दल के नेताओं का नाम लिखी।

उत्तर – 

1. बाल गंगाधर तिलक 

2. लाला लाजपत राय

3. विपिन चन्द्र पाल ।

 

प्रश्न: पाकिस्तान की माँग मुस्लिम लिग द्वारा कब और कहाँ रखी गई?

उत्तर – 1940 ई० में अपने लाहौर अधिवेशन में । 

 

प्रश्न: अंग्रेजों के विरुद्ध आजाद हिन्द फौज का गठन किसने किया?

उत्तर – नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने।

 

प्रश्न. लोगों को एकजुट करने के लिए राष्ट्रवादी नेता किस प्रकार के चिन्हों और प्रतीकों का प्रयोग कर रहे थे ?

उत्तर – राष्ट्रवादी नेताओं ने भारत के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय आंदोलन को गति देने के लिए विभिन्न प्रतीकों और चिन्हों का प्रयोग कर रहे थे

1. बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगा झंडा ( हरा पीला लाल) तैयार किया गया। जिसमें ब्रिट्रिश भारत के आठ प्रतो का प्रतिनिधित्व करते कमल के आठ फूल और हिंदूओ व मुस्लमानों का प्रतिनिधित्व करता एक अर्धचंद्र दर्शाया गया था।

2. गाँधीजी ने भी स्वराज्य का झंडा तैयार कर लिया यह भी (सफेद हरा लाल रंग का तिरंगा था। इसके मध्य में गाँधीवादी प्रतीक घरखों को महत्व दी गई जो स्वावलंबन का प्रतीक था

 

प्रश्न. सत्याग्रह का मूलमंत्र क्या था?

उत्तर – 

(i) अहिंसा के द्वारा किसी को भी जीता जा सकता है। 

(ii) संघर्ष में अंततः सत्य की ही जीत होती है।

(ii) आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है।

(iv) उत्पीड़क से मुकाबला के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।

(v) गांधीजी का विश्वास था की अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकता है।

 

प्रश्न. सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारणा से प्रभावित नहीं थे। क्यों?

उत्तर – सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारण से प्रभावित नहीं थे यह बात बिलकुल सत्य है जिसके निम्नलिखित कारण थे –  

(1) देश के हर वर्ग और सामाजिक समूहों पर उपनिवेशवाद का एक जैसा असर नहीं था उनके अनुभव भी अलग-अलग थे।

(2) अलग-अलग समूहों के लिए स्वराज के मायने भी भिन्न थे और सबके अपने हित थे।

(3) बहुत से पढ़े-लिखे भारतीय और अमीर लोग सीधे तौर पर अंग्रेजों से जुड़े थे, जिनके अपने अपने हित थे | उनका स्वराज व स्वतंत्रता के प्रति रुख उदासीन था |

(4) किसानों की अपनी समस्याएँ थी, जबकि अंग्रेजी सेना में शामिल भारतीय सिपाहियों की भी अपनी समस्याएँ थी।

(5) स्वराज आन्दोलन के लिए इन समूहों को खड़ा करना एक बहुत बड़ी समस्या थी । इनके एकता में भी टकराव के बिंदु निहित थे।

 

प्रश्न. गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिए नमक को ही मुख्य हथियार क्यों बनाया?

उत्तर –  गाँधी जी जानते थे कि नमक एक ऐसी वस्तु है जो भारत के सभी लोग उपयोग करते हैं चाहे वे अमीर हो गरीब हो।

 

प्रश्न: गांधी इरविन समझौता क्या था? 

उत्तर – 5 मार्च 1931 को गाँधी जी ने इरविन के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए। जिसमें गाँधी जी ने लंदन में होने वाले दुसरे गोलमेज सम्मलेन में हिस्सा लेने पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी। इससे पहले कांग्रेस गोलमेज सम्मलेन का बहिष्कार कर चुकी थी। इसके बदले ब्रिटिश सरकार राजनितिक बंदियों को रिहा करने पर राजी हो गई। गाँधी और इरविन के बीच इस समझौते को गांधी इरविन समझौता कहा जाता है। 

 

Q . प्रश्न : किन दो उद्योगपतियों के नेतृत्व में उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण का विरोध किया ?

उत्तर – पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास और जी.डी. बिडला

 

प्रश्न: फिक्की की स्थापना कब हुई ?

उत्तर – फिक्की की स्थापना 1927 ई० में हुई ।

 

प्रश्न. भारतीय व्यापारी और उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक नीतियों का विरोध क्यों किया? उनकी क्या माँगे थी?

उत्तर – पहले विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भारी मुनाफा कमाया था और वे ताकतवर हो चुके थे। अपने कारोबार को फैलने के लिए उन्होंने ऐसी औपनिवेशिक नौतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिविधियों में रुकावट आती थी।

उनकी माँगें निम्नलिखित थी

1. वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे

2. रुपया- स्टलिंग विदेशी विनिमय अनुपात में बदलाव चाहते थे।

 

प्रश्न. भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक नीतियों के विरोध में कौन कौन से कदम उठाए

उत्तर – भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक नीतियों का विरोध में निम्नलिखित कदम उठाएं:

1) व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए उन्होंने 1920 में भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस (इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस) और 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (पेफडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री फिक्की) का गठन किया।

2) उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण का विरोध किया। 

3) पहले सिविल नाफरमानी आंदोलन का समर्थन किया।

4) उन्होंने आंदोलन को आर्थिक सहायता दी और आयातित वस्तुओं को खरीदने या बेचने से इनकार कर दिया।

5) ज्यादातर व्यवसायी स्वराज को एक ऐसे युग के रूप में देखते थे जहाँ कारोबार पर औपनिवेशिक पाबंदियाँ नहीं होंगी और व्यापार व उद्योग निर्बाध ढंग से फल-फूल सकेंगे।

 

प्रश्न. भारतीय उद्योगपतियों द्वारा व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए किन दो व्यावसायिक संगठनों का गठन किया?

उत्तर – 

1) भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस (इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस) का 1920 में और

(ii) 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (पेफडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑपफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री-फिक्की।

 

प्रश्न. गोलमेज सम्मलेन के विफलता के बाद व्यावसायिक संगठनों का उत्साह मंद क्यों पड़ गया ?

उत्तर – गोलमेज सम्मलेन के विफलता के बाद व्यावसायिक संगठनों का उत्साह मंद पड़ने के निम्नलिखित कारण थे – 

(i) उन्हें उग्र गतिविधियों का भय था।

(ii) वे लंबी अशांति की आशंका से भग्न आशंकित थे।

(ii) कांग्रेस के युवा सदस्यों में समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए थे।

 

प्रश्न. औद्योगिक श्रमिक वर्ग ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में नागपुर के अलावा और कहीं भी बहुत बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया। कारण बताइए

उत्तर – उस समय बड़े-बड़े उद्योगपति कांग्रेस के नजदीक आ रहे थे, जिससे मजदुर वर्ग कांग्रेस से छिटकने लगे थे। मजदूर कांग्रेस से देश में समाजवादी नीतियाँ चाहते थे परन्तु उद्योगपति कांग्रेस के युवा समाजवादी नेताओं के प्रभाव से डरे हुए थे। कांग्रेस अपने कार्यक्रम में मजदूरों की माँगों को समाहित करने में हिचकिचा रही थी कांग्रेस को लगता था कि इससे उद्योगपति आंदोलन से दूर चले जाएँगे और साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों में फूट पड़ेगी।

 

प्रश्न. सविनय अवज्ञा आन्दोलन (नमक सत्याग्रह आन्दोलन) में औरतों की भूमिका का वर्णन कीजिए

( अथवा )

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान बहुत सारी औरतें अपनी जिंदगी में पहली बार अपने घर से निकलकर सार्वजनिक क्षेत्र में आई थी। इस कथन की पुष्टि कीजिए

उत्तर – इस आन्दोलन में औरतों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। गांधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान हजारों औरते उनकी बात सुनने के लिए घर से बाहर आ जाती थीं। उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया,नमक बनाया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की। बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गई। शहरी इलाकों में ज्यादातर ऊँची जातियों की महिलाएँ सक्रिय थी जबकि ग्रामीण इलाकों में सपन्न किसान परिवारों की महिलाएँ आंदोलन में हिस्सा ले रही थीं। गाँधी के आह्वान के बाद औरतों को राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्र दायित्व दिखाई देने लगा था।

 

प्रश्न. औरतों के विषय में गाँधी जी का क्या मानना था?

उत्तर – गाँधीजी का मानना था कि घर चलाना, चूल्हा-चौका सँभालना, अच्छी माँ व अच्छी पत्नी की भूमिकाओं का निर्वाह करना ही औरत का असली कर्तव्य है। इसीलिए लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में किसी भी महत्वपूर्ण पद पर औरतों को जगह देने से हिचकिचाती रही। कांग्रेस को उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति में ही दिलचस्पी थी।

 

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न अभ्यास 

Q1. व्याख्या करें :-

(क) उपनिवेशों में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ी हुई क्यों थी?

उत्तर – उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन उपनिवेशों में उत्पीडन और दमन के साथ गहराई से जुड़ा हुआ था | किसी भी औपनिवेशिक शासक के खिलाफ संघर्ष आपसी एकता के बिना संभव नहीं था। अलग-अलग लोगों के अलग-अलग हित और सबकी अपनी समस्याऐं थी आजादी के सबके अपने मायने थे। परन्तु राष्ट्रवाद के उदय के साथ ही औपनिवेशिक शासकों के साथ संघर्ष का ढंग ही बदल गया। राष्ट्रवाद ने समाज के सभी तबकों को अपनी निजी समस्याओं से ऊपर उठकर देश के लिए संघर्ष करने की प्रेणना दिया।

 

(ख) पहले विश्व युद्ध ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया।

उत्तर – प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में निम्न योगदान दिया 

(i) प्रथम विश्व युद्ध 1914-18ई तक चला। इस काल में भरतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गति मिली। साथ ही साथ राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा

(ii) अंग्रेजो ने भरतीयों से पूछे बिना भारत को युद्ध में एक पार्टी बना दिया साथ ही साथ भारत के संसाधनों का अपने हित के लिए धडल्ले से प्रयोग किया इससे भारतीयों में अंग्रेजो के प्रति विरोध करने की जज्बा पैदा हुआ।

(iii) यद्यपि मुस्लिम लीग अंग्रजी सरकार की बांदी थी परन्तु प्रथम महायुद्ध के घटनाओं के कारण इसे कांग्रेस के समीप आना पड़ा जिससे राष्ट्रीय आंदोलनों में काफी सहायता मिली।

 (iv) इस महायुद्ध के कारण मुस्लिम विशेषकर मुस्लिम लीग अंग्रेजों के विरुद्ध हो गये क्योंकि महायुद्ध की समाप्ति के बाद मित्र राष्ट्रों ने तुर्की के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया।

 

(ग) भारत के लोग रॉलट एक्ट के विरोध में क्यों थे ?

उत्तर – भारतियों के रोलेक्ट एक्ट के विरोध करने के निम्नलिखित कारण थे –  

1) इस कानून ने अंग्रेजी सरकार को यह शक्ति दे दी थी कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाये जेल में डाल दे।

(2) उसके लिए किसी वकिल दलील और अपील की अनुमति नहीं थी।

(3) यह कानून भारतीयों को उत्पिडित करने के उदेश्य से लाया गया था

(4) अंग्रेजी शासन रॉलेक्ट एक्ट लाकर स्वतंत्रता संग्राम की लहर को दबाना चाहती थी।

 

(घ) गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का फैसला क्यों लिया?

उत्तर – गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लिए जाने के निम्नलिखित कारण थे-  

(i) चौरी-चौरा की घटना हिंसक हो चुकी थी जिसमे आन्दोलनकारियों ने 22 पुलिसकर्मियों को चौकी में जिन्दा जला दिया था।

(ii) चौरी चौरा के घटना से गाँधीजी काफी परेशान हो उठे जिससे उन्हें विश्वास हो गया कि लोगों को वे अब शांत नहीं रख सकेंगे।

(iii) असहयोग आन्दोलन अहिंसा पर आधारित था जबकि ऐसा नहीं हुआ

(iv) वे सोचने लगे कि यदि लोग हिंसक हो जाएगे तो अंग्रेजी सरकार भी उतेजित हो जाएगी। जिससे र्निदोष लोग भी मारे जाएगे ऐसे में उन्होंने 1922 मेवे इस आंदोलन को वापस लेना ही उचित समझा। 

 

02. सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है?

उत्तर – सत्याग्रह के विचार का मतलब निम्न हैं-

(i) प्रतिशोध या बदले की भावना के बिना संघर्ष करना

(ii) अहिंसा के बल पर संघर्ष कर विजय प्राप्त करना

(iii) सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर

(iv) उत्पीड़क शत्रु ही नहीं अपितु सभी को हिंसा की अपेक्षा सत्य को स्वीकार करने पर विवश करना।

 

Q3. निम्नलिखित पर अखवार के लिए रिपोर्ट लिखे – 

(क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड 

(ख) साइमन कमीशन

उत्तर – 

(क) जलियावाला बाग हत्याकांड :- 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर के जलियावाला बाग में सैकड़ों बेकसूर हिन्दुस्तानियों की निर्मम हत्या की घटना हुई। 10 अप्रैल को पुलिस ने अमृतसर में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चला दी। इसके बाद लोग बैंकों, डाकखानों और रेलवे स्टेशनों पर हमले करने लगे। मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और जनरल डायर ने कमान सँभाल ली। उस दिन अमृतसर में बहुत सारे गाँव वाले एक मेले में शिरकत करने के लिए जलियाँवाला बाग मैदान में जमा हुए थे। यह मैदान चारों तरफ से बंद था। शहर से बाहर होने के कारण वहाँ जुटे लोगों को यह पता नहीं था कि इलाके में मार्शल लॉ लागू किया जा चुका है। जनरल डायर हथियारबंद सैनिकों के साथ वहाँ पहुॅचा और जाते ही उसने मैदान से बाहर निकलने के सारे रास्तों को बंद कर दिया। इसके बाद उसके सिपाहियों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियों चला दी। जिससे सैंकड़ों लोग मारे गए।

 

(ख) साइमन कमीशन –  1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा तो उसका स्वागत ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ (साइमन कमीशन गो बैंक) के नारों से किया गया। यह इस कमीशन के 4-5 अंग्रेज अधिकारी थे कांग्रेस और मुस्लिम लीग जैसी सभी पार्टियों ने इस कमीशन के विरोध प्रदर्शन में भाग लिया। अंग्रेजो द्वारा साइमन कमीशन को लाने के निम्नलिखित उदेश्य थे – 

(i) 1919 के गर्वनमेंट ऑफ इंडिया एक्ट की समीक्षा की जा सके।

(ii) यह सुझाव दिया जा सके कि भारतीय प्रशासन में कौन से नए सुधार लाया जा सके (भारत में पैदा तत्कालीन राजनीतिक गतिरोध को दूर किया जा सके परन्तु भारतियों के इसके विरोध के निम्नलिखित कारण थे- 

1. इस कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था।

2. इस कमीशन की धाराओं में भरतीयों को स्वराज्य दिए जाने का कोई जिक्र नहीं था।

 

Q. 4. इस अध्याय में दी गई भारत माता की छवि और अध्याय 1 में दी गई जर्मेनिया की छवि की तुलना कीजिए। 

उतर – इस प्रश्न का उत्तर पीडीएफ में दिया गया है। 

 

चर्चा करें  :- 

प्रश्न.  1921 में असहयोग आंदोलन में शामिल होने वाले सभी सामाजिक समूहों की सूची बनाइए। इसके बाद उनमें से किन्हीं तीन को चुन कर उनकी आशाओं और संघर्षों के बारे में लिखते उत्तर हुए यह दर्शाइए कि वे आंदोलन में शामिल क्यों हुए?

उत्तर – 1921 में असहयोग आंदोलन में भारत के विभिन्न सामाजिक समूहों ने हिस्सा लिया लेकिन हरेक की अपनी-अपनी आकांक्षाएँ थीं। आंदोलन में शामिल प्रमुख सामाजिक समूह निम्नलिखित थे- शिक्षित मध्यम वर्ग, भारतीय दस्तकार और मजदूर, भारतीय किसान पूँजीपति वर्ग, जमींदार वर्ग तथा व्यापारिक वर्ग सभी ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया।

1. शिक्षित मध्यम वर्ग शहरों में शिक्षित मध्यम वर्ग ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की। हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल कॉलेज छोड़ दिए, शिक्षकों ने इस्तीफे दे दिए। वकीलों ने मुकदमै लड़ने बंद कर दिए। शिक्षित वर्ग आंदोलन में शामिल इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने देखा कि उनके बराबर पढ़े-लिखे अंग्रेज उनके अफसर बन जाते थे। भारतीय लोगों को वेतन भी अंग्रेजों के मुकाबले कम मिलता था। वे केवल क्लर्क ही पैदा होते थे और क्लर्क ही मर जाते थे। इस भेदभावपूर्ण नीति के कारण शिक्षित वर्ग अंग्रेज सरकार का विरोधी था।

2. व्यापारी वर्ग बहुत से स्थानों पर व्यापारियों ने विदेशी चीजों का व्यापार करने या – से विदेशी व्यापार में पैसा लगाने से इनकार कर दिया। अंग्रेज सरकार की गलत नीतियाँ के कारण व्यापारी वर्ग पूरी तरह बरबाद हो चुका था। अंग्रेज सस्ते दामों पर कच्चा माल ब्रिटेन ले जाते थे और वहाँ से तैयार माल लाकर अधिक कीमत पर भारत में बेचते थे। भारतीय व्यापारियों को इससे बहुत नुकसान होता था।

3. सामान्य जनता असहयोग आंदोलन एक जन आंदोलन बन गया था क्योंकि आम – जनता ने विदेशी कपड़ों तथा चीजों का बहिष्कार किया, शराब की दुकानों की पिकेटिंग की और विदेशी कपड़ों की होली जलाई आम जनता अंग्रेजों के अत्याचार से दुखी हो चुकी थी इसलिए उसने बढ़-चढ़कर असहयोग आंदोलन में भाग लिया।

4. बागान मजदूर गांधी जी के विचार और स्वराज की अवधारणा जब मजदूरों को समझ में आई तो वे भी बागानों की चारदीवारियों से बाहर निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हो गए। वे अपने अधिकारियों की अवहेलना करने लगे। वे बागानों को काम छोड़कर अपने घरों को लौट गए क्योंकि उनको लगने लगा कि गांधी राज आते ही सबको जमीन मिल जाएगी।

 

प्रश्न 2. नमक यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करें कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था। 

उत्तर – 31 जनवरी 1930 को गांधी जी ने इरविन को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने 11 माँगों का उल्लेख किया था। इसमें सबसे महत्वपूर्ण माँग नमक कर को खत्म करने के बारे में थी। नमक का अमीर-गरीब सभी प्रयोग करते थे। यह भोजन का अभिन्न हिस्सा था। इसलिए नमक पर कर को ब्रिटिश सरकार का सबसे दमनकारी पहलू बताया था। 11 मार्च तक उनकी माँगे नहीं मानी गई तो 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने अपने 56 स्वयंसेवकों के साथ नमक यात्रा शुरू की। यह यात्रा साबरमती से दांडी नामक गुजराती तटीय कस्बे में जाकर खत्म होनी थी। 6 अप्रैल को वे दाँड़ी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालदर नमक बनाना शुरू कर दिया। यह कानून का उल्लंघन था।

यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था – 

1. इस बार लोगों को न केवल अंग्रेजों को सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया जाने लगा। हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए।

2. यह यात्रा साबरमती से 240 किलोमीटर दूर दाँडी में जाकर समाप्त होनी थी। गांधी जी की टोली ने 23 दिनों तक हर रोज लगभग 10 मील का सफर तय किया। गांधी जी जहाँ भी रुकते हजारों लोग उन्हें सुनने आते। इन सभाओं में गांधी जी ने स्वराज का अर्थ स्पष्ट किया और कहा कि लोग अंग्रेजों की शांतिपूर्ण अवज्ञा करें यानि कि अंग्रेजों को कहा न मार्न।

इस प्रकार गांधी जी की नमक यात्रा उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक बन गई।

 

प्रश्न 3. कल्पना कीजिए कि आप सिविल नाफरमानी आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिला हैं। बताइए कि इस अनुभव का आपके जीवन में क्या अर्थ होता?

उत्तर – सिविल नाफरमानी आंदोलन में अनेक औरतों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। गांधी जी की बातों को सुनने के लिए औरतें अपने घरों से बाहर आ जाती थी। 

मैंने भी इस समय अनेक जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की, मैं भी अन्य महिलाओं के साथ जेल गई। इस आंदोलन के दौरान मैंने यह अनभव किया कि शहरी क्षेत्रों में सभी वर्गों की महिलाओं ने भाग लिया परंतु इसमें उच्च जातियों की महिलाएं अधिक थी जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में सम्पन्न किसान परिवार की महिलाओं ने अधिक भाग लिया।

इस दौरान मैंने पाया कि सभी राष्ट्रसेवा को अपना प्रथम कर्तव्य मानने लगे। हम महिलाओं में यह आत्मविश्वास जागा कि वे घर के अतिरिक्त राष्ट्रसेवा का दायित्व भी निभा सकती हैं। परंतु कांग्रेस ने लंबे समय तक महिलाओं को उच्च पद नहीं दिए। उन्हें आंदोलनों में केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति तक ही सीमित रखा।

 

प्रश्न 4 राजनीतिक नेता पृथक निर्वाचिका के सवाल पर क्यों घंटे हुए थे?

उत्तर – पृथक चुनाव प्रणाली का अभिप्राय ऐसे चुनाव क्षेत्रों से है जिनका निर्माण धर्म के आधार पर किया जाए अर्थात् एक धर्म का व्यक्ति केवल अपने धर्म के व्यक्ति को ही वोट देगा। अंग्रेजों ने भारत में फूट डालने के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण किया। अपने इस कार्य में अंग्रेज सरकार काफी हद तक सफल रही क्योंकि पृथक निर्वाचन क्षेत्रों पर भारतीय आपस में बैट गए

1. कांग्रेस पृथक निर्वाचन पद्धति का विरोध कर रही थी। पहले अंग्रेजों ने केवल हिंदू और मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की बात कही थी किंतु बाद में जब हरिजनों को भी हिंदुओं से अलग करके पृथक निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटने की बात कही जाने लगी तो कांग्रेस ने इसका खुलकर विरोध किया।

2 दलितों के उधार में लगे बी.आर. अम्बेडकर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र चाहते थे। उनका मानना था कि उनकी सामाजिक अपंगता केवल राजनीतिक सशक्तिकरण से ही दूर हो सकती है।

3. भारत को मुस्लिम समुदाय भी पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के पक्ष में था। मुहम्मद अली जिन्ना का कहना था कि यदि मुसलमानों को केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें दी जाएँ और मुस्लिम बहुल प्रातों में मुसलमानों को आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए तो वे मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार इन बातों से पता चलता है कि पृथक निर्वाचन क्षेत्रों को लेकर भारतीयों में फूट पड़ गई थी। कांग्रेस पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के खिलाफ थी जबकि दलित वर्ग तथा मुस्लिम वर्ग इसके पक्ष में थे जिन्ना और अम्बेडकर जैसे नेता चाहते थे कि पृथक निर्वाचन पद्धति को लागू किया जाए जिससे दलितों और मुसलमानों को राजनीति में विशिष्ट स्थान प्राप्त हो सके जबकि गांधी जी इसके विरुद्ध थे। उनका कहना था कि पृथक निर्वाचन पद्धति से भारत के विभिन्न धर्मों के लोगों में रोष उत्पन्न होगा, उनकी एकता समाप्त हो जाएगी। इसलिए वे इसे स्वीकारने के पक्ष में नहीं थे। 

 

परियोजना कार्य :- 

प्रश्न 1. कीनिया के उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन का अध्ययन करें। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की उत्तर तुलना कीनिया के स्वतंत्रता संघर्ष से करें।

उत्तर – कीनिया की खोज सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने की। 1498 में वास्को डी गामा मोम्बासा पहुँचा । इसके बाद समुद्री रास्ते से पुर्तगालियों ने कीनिया के साथ मसालों का व्यापार शुरू किया। 17वीं शताब्दी में ब्रिटिश, डच तथा अरबों ने भी इस क्षेत्र में आना शुरू किया और 1730 तक इन यूरोपीय शक्तियों ने पुर्तगालियों को कीनिया से बाहर कर दिया। 1885 में जर्मनों ने इस पर कब्जा किया और 1890 में इसके तटीय प्रदेश ब्रिटेन को सौंप दिए। अंग्रेजों ने कोनिया यूगांडा रेलवे का निर्माण किया इसका कुछ स्थानीय जनजातियों ने विरोध किया। 20वीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय किसानों ने कॉफी और चाय की खेती करनी प्रारंभ कर दी 30,000 श्वेत लोग यहाँ आकर बस गए और लाखों किकियू (स्थानीय जनजाति के लोग) भूमिहीन हो गए।

1952 से 1959 तक कीनिया आपातकालीन स्थिति में रहा तथा यहाँ माऊ-माऊ विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ पूरे जोरशोर से चला। यूरोप की गोरी जातियाँ कीनिया के अश्वेत लोगों को निम्न कोटि का मानती थी। इस सिद्धात की तीव्र प्रतिक्रिया हुई और कीनिया में राष्ट्रवाद का प्रसार होने लगा। राष्ट्रवाद को मुख्य प्रेरणा जातीय समानता के सिद्धात से मिली। पाश्चात्य संपर्क और पाश्चात्य साहित्य ने भी कीनिया के प्रबुद्ध लोगों में राष्ट्रवाद की भावना जगाई। किंतु 1956 तक माऊ-माऊ विद्रोह पूरी तरह कुचल दिया गया। इस विद्रोह से यह सिद्ध हो चुका था कि कीनिया के लोग राष्ट्रवाद की भावना से भर चुके थे और उन्हें अधिक समय तक गुलाम नहीं बनाया जा सकता था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई अफ्रीकी देशों में स्वतंत्रता की लहर आई। विश्व युद्ध के कारण उपनिवेशी शक्तियाँ कमजोर पड़ चुकी थीं। परिणामस्वरूप कीनिया में भी 1957 में पहले प्रत्यक्ष चुनाव कराए गए अंग्रेजों ने सोचा था कि वहाँ उदारवादियों को सता साँप दी जाएगी। किंतु ‘जीमो केनियाटा की पार्टी कीनिया अफ्रीकन नेशनल यूनियन (KANU) ने अपनी सरकार बना ली और 12 दिसम्बर 1963 को कीनिया आजाद हो गया।

भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन तथा कीनिया के स्वतंत्रता संघर्ष की तुलना

समानताएँ – 

1. दोनों ही देशों का साम्रज्यवादी शक्तियों ने शताब्दियों तक शोषण किया। अतः दोनों ही आर्थिक पिछडेपन और सामाजिक रूढिवादिता से पीड़ित रहें। दोनों ही देशों की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दुर्बलता का लाभ उठाकर यूरोपीय शक्तियों ने यहाँ उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद का प्रसार किया।

2. दोनों ही देशों में राष्ट्रवाद की लहर फैली। दोनों ही देश उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के विरोधी थे। दोनों देशों के लोगों ने पूरी ताकत से उपनिवेशवादी शक्तियों का विरोध किया और अंत में इसमें सफलता पाई।

3. अपने आर्थिक-सामाजिक विकास के लिए दोनों ही महाद्वीप विदेशी सहायता लेने के लिए विवश हो गए। अतः सहायता देने वाली शक्तियों को सहायता प्राप्त देशों में अपना राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के पर्याप्त अवसर मिलते रहते हैं।

असमानताएँ:

1. भारत का राष्ट्रवाद कीनिया के मुकाबले अधिक परिपक्व था। भारत में राष्ट्रीय आंदोलन में समाज के सभी वर्गों ने भाग लिया। जातीय, भाषायी तथा धार्मिक आधार पर विभाजित सभी वर्ग राष्ट्रीयता के प्रश्न पर एकजुट हो गए। जबकि कीनिया में राष्ट्रीय आंदोलन स्थानीय जनजातियों द्वारा ही चलाए गए जब इन स्थानीय जनजातियों को अपनी रोजी-रोटी छिनती नजर आई तो इन्होंने विद्रोह कर दिया। इनके विद्रोहों में वो एकता दिखाई नहीं देती जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विद्रोहों में दिखती है।

2. भारत में राष्ट्रीय आंदोलन अधिकांशतः अहिंसक तथा शांतिपूर्ण रहा केवल कुछ अपवादों को छोड़कर क्योंकि यहाँ राष्ट्रवादी नेता सुनियोजित कार्यक्रम चलाते थे। उनके पीछे राष्ट्रवाद की एक लंबी परंपरा की तथा महात्मा गांधी जैसे चमत्कारिक व्यक्तित्व के नेता थे जो अहिंसा के पुजारी थे। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो भारत का राष्ट्रीय आंदोलन उतना उग्र नहीं था जितना कीनिया का था। रंगभेद और कबीलेवाद की समस्याओं का सामना कीनिया को करना पड़ा। कीनिया के नेता भारतीय नेताओं की तुलना में अधिक उग्र रहे।

3. भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का कारण यहाँ के शिक्षित वर्ग द्वारा राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करना था। यहाँ के प्रबुद्ध वर्ग ने फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति आदि के समानता, स्वतंत्रता तथा न्याय जैसे विचारों को आम जनता तक पहुँचाया। भारत में शिक्षा का प्रसार कीनिया के मुकाबले अधिक था। इसलिए कीनिया में स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे विचारों को फैलने में काफी समय लगा। वहाँ राष्ट्रवादी विचार देर से फैले।

इस प्रकार हमने देखा कि भारत और कीनिया के स्वतंत्रता संघर्ष में काफी समानताएँ थीं। किंतु साथ ही काफी असमानताएँ भी था। 

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